हम सामान्यतः यह मान लेते हैं कि ज्ञान सीमित है और अज्ञान असीमित। परंतु गहराई से देखा जाए तो ज्ञान सीमित है और अज्ञान भी सीमित है। अंतर केवल इतना है कि अज्ञान की मात्रा अधिक प्रतीत हो सकती है, किन्तु वह भी हमारी सीमित बुद्धि और सीमित इन्द्रियों के दायरे में ही अस्तित्व रखता है।
हम उसी का अज्ञान अनुभव कर सकते हैं जो किसी न किसी रूप में हमारे अनुभव, विचार या कल्पना के क्षेत्र में आया हो। जिस वस्तु का हमें कोई संकेत तक नहीं है, उसके विषय में अज्ञान भी नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए, हम नहीं जानते कि स्वर्ग है या नहीं। इस न जानने के कारण हमने उसके बारे में असंख्य मान्यताएँ, कल्पनाएँ और धारणाएँ निर्मित कर ली हैं। यदि किसी दिन उसका प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाए, तो उन सभी कल्पनाओं और धारणाओं का स्वतः अंत हो जाएगा।
इस दृष्टि से देखा जाए तो अज्ञान का अर्थ केवल न जानना नहीं है, बल्कि जो नहीं जाना गया है उसके बारे में कल्पनाएँ खड़ी कर लेना है। ज्ञान एक है, जबकि अज्ञान अनेक रूपों में प्रकट होता है। ज्ञान प्रत्यक्षता है, अज्ञान मानसिक निर्माण है।
अज्ञान उस सूखे जंगल के समान है जो पहले से ही मृत पड़ा है, और ज्ञान उस जीवंत अग्नि के समान है जिसकी एक छोटी-सी चिनगारी भी पूरे जंगल को भस्म कर सकती है। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि अज्ञान असीमित है। हाँ, ज्ञान की तुलना में वह अधिक दिखाई दे सकता है, परंतु असीमित नहीं। असीमित तो वह है जो बुद्धि और भाषा की पकड़ से परे है — जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
वास्तव में, इस जगत की प्रत्येक वस्तु अपने अंतिम सत्य में अज्ञेय है। हम वस्तुओं के बारे में कुछ जानकारियाँ, गुण, स्वरूप या व्यवहार जान सकते हैं, परंतु यह दावा नहीं कर सकते कि हमने उन्हें पूर्णतः जान लिया है। हमारे सभी उपकरण — इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — सीमित हैं। सीमित साधनों से असीम को कैसे जाना जा सकता है?
चन्द्रमा, चन्द्रमा है। उसके आगे जो कुछ भी हम उसके बारे में कल्पना करते हैं, वह विचार है, धारणा है, अनुमान है। और जहाँ अनुमान है, वहाँ अज्ञान की संभावना भी है। वस्तुएँ बस हैं। उनका अस्तित्व स्वयं में पूर्ण है। हमारी धारणाएँ उन्हें न बड़ा करती हैं, न छोटा।
इसी प्रकार यह संसार भी एक स्वप्नवत अनुभव है। स्वप्न को जानना और न जानना, दोनों का मूल्य अंततः समान है। क्योंकि जो स्वप्न को जानने निकला है, वह स्वयं भी उसी स्वप्न का एक भाग है। भ्रमित व्यक्ति और भ्रम — दोनों एक ही माया के भीतर हैं। परंतु जो जाग गया, वह माया के खेल को देखता है, उसमें उलझता नहीं।
हम प्रायः आवश्यकता से अधिक चतुर बनने का प्रयास करते हैं, और यही हमारे दुख का कारण बनता है। बुद्धि कोई अनुभूति लेकर आती है और तुरंत कहती है — "कुछ हुआ है, प्रतिक्रिया करो, निर्णय लो, निष्कर्ष निकालो।" पर यदि उसी क्षण यह प्रश्न उठे कि "क्या मैं वास्तव में जानता हूँ कि क्या हुआ है?" तो स्थिति बदल जाती है।
सत्य तो यह है कि हम न कुछ निश्चित रूप से जानते हैं, न जान सकते हैं। यह स्वीकार कर लेने पर समस्या का बड़ा भाग समाप्त हो जाता है।
समस्या न जानने में नहीं है; समस्या जानने के दावे में है। न जानना अबोधता है, और यही अबोधता हमारे वास्तविक स्वरूप के निकट ले जाती है। अबोधता मूर्खता नहीं है, बल्कि वह विनम्रता है जिसमें मन स्वीकार करता है कि सत्य उसकी धारणाओं से कहीं बड़ा है।
चित्त में निरंतर विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ और अनुभव उठते रहते हैं। यदि हम उनका विश्लेषण न करें, उन पर अर्थ आरोपित न करें, तो वे मात्र घटनाएँ हैं। और यदि हम उनका विश्लेषण भी करें, तब भी अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच सकते, क्योंकि विश्लेषण करने वाला उपकरण स्वयं सीमित है।
इसलिए शायद सबसे प्रामाणिक कथन यही है:
मैं नहीं जानता।
और जो यह ईमानदारी से स्वीकार कर लेता है, वह जानने के अहंकार से मुक्त होने लगता है।
वहीं से मौन का द्वार खुलता है, वहीं से शांति का जन्म होता है, और वहीं से सत्य की सुगंध आने लगती है।
क्योंकि अंततः ज्ञान का शिखर भी उसी स्थान पर पहुँचता है जहाँ साधक विनम्र होकर कहता है —
"जो है, वह है। मैं उसे पूरी तरह नहीं जानता, पर उसके प्रति खुला हूँ।"
यही अबोधता है, यही सहजता है, और संभवतः यही जागरण का प्रारम्भ भी।
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